
एडवोकेट अजात शत्रु(आलेख)
उच्च शिक्षा में समानता और न्याय सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लाए गए UGC (Protection of Equity in Higher Education Institutions) Regulation 2026 को लेकर देशभर में गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। यह विनियम ऐसे समय में प्रस्तावित किया गया है, जब पहले से ही अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम, आंतरिक शिकायत समितियाँ (ICC), विश्वविद्यालय अनुशासन नियम, और भारतीय दंड संहिता जैसी मजबूत कानूनी व्यवस्थाएँ मौजूद हैं। ऐसे में एक नया और कठोर ढांचा खड़ा करना न केवल अनावश्यक प्रतीत होता है, बल्कि यह उच्च शिक्षण संस्थानों में सामाजिक तनाव को भी जन्म दे सकता है।
इस विनियम का सबसे विवादास्पद पहलू यह है कि यह समता (Equity) स्थापित करने के बजाय असंतुलन और अविश्वास को बढ़ावा देता है। Equity Officer और Equity Committee को दी गई व्यापक शक्तियाँ, बिना पर्याप्त जवाबदेही और संतुलन के, एक वर्ग विशेष के लिए भय का कारण बन सकती हैं। विशेष रूप से चिंता इस बात की है कि झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर अंकुश लगाने का कोई स्पष्ट प्रावधान इसमें नहीं है। शिकायतकर्ता के अधिकारों पर जोर है, लेकिन आरोपित के संरक्षण और निष्पक्ष सुनवाई की गारंटी कमजोर दिखाई देती है।
एक और गंभीर कमी यह है कि Equity Committee में अनारक्षित वर्ग (Unreserved Category) के प्रतिनिधित्व को अनिवार्य नहीं किया गया है। यदि समिति का गठन ही असंतुलित होगा, तो निष्पक्षता की उम्मीद कैसे की जा सकती है? इसके अलावा, Equity Report के बाद संस्थान प्रमुख स्तर पर मामले के समाधान या समझौते (Compounding) का कोई विकल्प न होना, विवादों को सुलझाने के बजाय उन्हें लंबा और जटिल बना सकता है।
आलोचकों का मानना है कि मौजूदा स्वरूप में यह विनियम झूठी शिकायतों का पैंडोरा बॉक्स खोल सकता है, जिसका दुरुपयोग छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों—विशेषकर पुरुषों और अनारक्षित वर्ग से आने वाले व्यक्तियों—के खिलाफ किया जा सकता है। इससे शैक्षणिक परिसरों में भय, आपसी अविश्वास और ध्रुवीकरण की स्थिति पैदा होने की आशंका है, जो शिक्षा के मूल उद्देश्य के विपरीत है।
राजनीतिक दृष्टि से भी यह मुद्दा अत्यंत संवेदनशील है। इतिहास गवाह है कि 1990 में मंडल राजनीति ने समाज को गहराई से विभाजित किया था। आज एक बार फिर आशंका जताई जा रही है कि मौजूदा सरकार अनजाने में उसी राह पर बढ़ रही है। वहीं, विपक्ष—विशेषकर कांग्रेस और उसके नेता राहुल गांधी—की चुप्पी भी सवालों के घेरे में है। ऐसे व्यापक प्रभाव वाले विषय पर स्पष्ट और जिम्मेदार राजनीतिक संवाद अनिवार्य है।
निस्संदेह, भेदभाव के खिलाफ कठोर रुख जरूरी है, लेकिन न्याय तभी सार्थक है जब वह संतुलित और निष्पक्ष हो। UGC Regulation 2026 को बिना व्यापक परामर्श, छात्र-शिक्षक संगठनों की भागीदारी और मजबूत सुरक्षा प्रावधानों के लागू करना, उच्च शिक्षा में समता लाने के बजाय सामाजिक ताने-बाने को कमजोर कर सकता है। सरकार और UGC को चाहिए कि वे इस विनियम की पुनर्समीक्षा करें, ताकि समता का लक्ष्य विभाजन की कीमत पर हासिल न हो।









