संवैधानिक रूप से खारिज की गई अवैध और पुरानी नामावली के उपयोग पर आरपीए ने जम्मू-कश्मीर पहाड़ी सलाहकार बोर्ड की कड़ी निंदा की

सबका जम्मू कश्मीर
जम्मू/राजौरी, अनिल भारद्वाज। राष्ट्रीय पहाड़ी आंदोलन (आरपीए) ने जम्मू-कश्मीर पहाड़ी सलाहकार बोर्ड द्वारा सरकारी आदेशों और संवैधानिक प्रावधानों की अवहेलना करते हुए हाल ही में जारी एक कैलेंडर सहित आधिकारिक प्रकाशनों में समाप्त और अवैध नामावली “पहाड़ी स्पीकिंग पीपल का निरंतर उपयोग किए जाने की तीव्र शब्दों में निंदा और कड़े शब्दों में भर्त्सना की है। यह कृत्य क़ानून की खुली अवमानना तथा पहाड़ी जातीय समूह की संवैधानिक पहचान को कमजोर करने का सुनियोजित प्रयास है। जम्मू-कश्मीर सरकार ने एस.ओ. 537 दिनांक 19 अक्टूबर 2022, जो कि जम्मू-कश्मीर राजपत्र में प्रकाशित है, के माध्यम से जम्मू-कश्मीर आरक्षण नियम, 2005 में संशोधन करते हुए जहाँ-जहाँ भी “पहाड़ी स्पीकिंग पीपल (पीएसपी) शब्द था, उसे स्पष्ट रूप से “पहाड़ी जातीय लोग से प्रतिस्थापित किया। इस वैधानिक सुधार को आगे संविधान (जम्मू-कश्मीर) अनुसूचित जनजाति आदेश (संशोधन) अधिनियम, 2023 द्वारा और अधिक सुदृढ़ किया गया, जिसके तहत 1989 के आदेश में संशोधन कर “पहाड़ी स्पीकिंग पीपल” नहीं, बल्कि पहाड़ी जातीय समूह को अनुसूचित जनजाति के रूप में संवैधानिक मान्यता दी गई। पुराने और अप्रचलित शब्द का अंतिम एवं निर्णायक विलोपन एस.ओ. 176 दिनांक 15 मार्च 2024 के माध्यम से किया गया, जिसके द्वारा जम्मू-कश्मीर आरक्षण नियम, 2005 के नियम 2 की धारा(एक्सआईए) को हटा दिया गया और पहाड़ी स्पीकिंग पीपल को विधिक ढांचे से पूरी तरह समाप्त कर दिया गया।

इस खुली अवहेलना पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए, राष्ट्रीय पहाड़ी आंदोलन के अध्यक्ष डा. सुरेश कुमार ने कहा कि एस.ओ. 537 (2022), उसके बाद 2023 के संवैधानिक संशोधन, तथा लोकसभा/राज्यसभा द्वारा क्रमश छह फरबरी 2024/09 फरवरी 2024 को पारित अधिनियम और माननीय राष्ट्रपति, भारत सरकार की अंतिम स्वीकृति के बाद, पहाड़ी स्पीकिंग पीपल शब्द के उपयोग के लिए कोई भी कानूनी, प्रशासनिक या नैतिक स्थान शेष नहीं रह जाता। उन्होंने कहा कि इसका उपयोग किसी लिपिकीय त्रुटि का परिणाम नहीं, बल्कि संविधान, संसद और विधिवत अधिसूचित राजपत्र क़ानून के विरुद्ध एक जानबूझकर, सोचा-समझा और दुर्भावनापूर्ण अवज्ञाकारी कृत्य है।

सामाजिक कल्याण विभाग की भूमिका पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए डॉ. सुरेश कुमार ने कहा कि स्पष्ट सरकारी और राजपत्र आदेशों के बावजूद सामाजिक कल्याण विभाग, जम्मू-कश्मीर पहाड़ी सलाहकार बोर्ड के माध्यम से पुराने और समाप्त नाम “पहाड़ी स्पीकिंग पीपल” के उपयोग को न केवल जारी रखे हुए है, बल्कि उसे अनुमति भी दे रहा है। यह अत्यंत चिंताजनक है, क्योंकि यही विभाग उन सरकारी आदेशों को लागू करने का उत्तरदायी है जिनके तहत पहाड़ी स्पीकिंग पीपल को पहाड़ी जातीय समूह से प्रतिस्थापित किया गया। पुराने नाम का निरंतर प्रयोग वैधानिक और संवैधानिक निर्देशों के प्रति घोर उदासीनता को दर्शाता है और इससे पहाड़ी समुदाय में गहरा आक्रोश उत्पन्न हुआ है।
sabka jammu kashmir 17 JANUARY 2026.qxd_1
डॉ. सुरेश कुमार ने आगे कहा कि जब कोई वरिष्ठ अधिकारी जानबूझकर बाध्यकारी राजपत्र अधिसूचनाओं और संवैधानिक संशोधनों की अनदेखी करता है, तो वह कृत्य प्रशासनिक भूल नहीं रह जाता, बल्कि संस्थागत तोड़फोड़ का रूप ले लेता है। ऐसा आचरण प्रशासनिक अहंकार को दर्शाता है, क़ानून के शासन को कमजोर करता है, जनता में भ्रम पैदा करता है और उस क्षेत्र में शांति एवं सौहार्द को प्रभावित कर सकता है, जहाँ पहाड़ी समुदाय सदैव शांतिप्रिय और क़ानून का पालन करने वाला रहा है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि यह अवैध कैलेंडर कोई निरापद प्रकाशन नहीं, बल्कि पहाड़ी जातीय समूह की अनुसूचित जनजाति पहचान को कमजोर करने का एक राजनीतिक वक्तव्य है।

पहाड़ी जातीय समूह को प्रदान की गई अनुसूचित जनजाति की स्थिति दशकों के संघर्ष के बाद तथा भारत की संसद की सामूहिक इच्छा के माध्यम से, माननीय प्रधानमंत्री और माननीय केंद्रीय गृह मंत्री के नेतृत्व में, राजौरी, पुंछ, उड़ी, करनाह और आस-पास के क्षेत्रों के लोगों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने के लिए प्राप्त हुई। कानूनी रूप से मृत नामावली से चिपके रहकर, पहाड़ी सलाहकार बोर्ड और सामाजिक कल्याण विभाग अप्रत्यक्ष रूप से संसद के अधिकार को चुनौती दे रहे हैं और लाखों पहाड़ियों की संवैधानिक आकांक्षाओं का उपहास कर रहे हैं।

अतः राष्ट्रीय पहाड़ी आंदोलन अवैध कैलेंडर को तत्काल वापस लेने और उसे निरस्त करने, संबंधित सचिव से सार्वजनिक और बिना शर्त माफी की मांग करता है, तथा बोर्ड के नाम और सभी आधिकारिक दस्तावेजों को विधिक रूप से अनिवार्य शब्द “पहाड़ी जातीय समूह” के अनुरूप तुरंत संशोधित किए जाने की मांग करता है।
आरपीए माननीय प्रधानमंत्री भारत सरकार, माननीय केंद्रीय गृह मंत्री, भारत की संसद तथा माननीय उपराज्यपाल, जम्मू-कश्मीर से अपील करता है कि वे राजपत्र क़ानून और संवैधानिक आदेशों का खुला उल्लंघन करने वाले अधिकारियों के विरुद्ध कठोर, उदाहरणात्मक और समयबद्ध कार्रवाई करें, ताकि शासन और न्याय में जनता का विश्वास कमजोर न पड़े। डॉ. सुरेश कुमार ने चेतावनी दी कि यदि यह कैलेंडर सार्वजनिक किया गया, यदि कोई माफी जारी नहीं की गई और यदि आवश्यक कानूनी सुधार तुरंत नहीं किए गए, तो राष्ट्रीय पहाड़ी आंदोलन अन्य समान विचारधारा वाले पहाड़ी संगठनों के साथ मिलकर लोकतांत्रिक और प्रतीकात्मक रूप से इस कैलेंडर को अस्वीकार करने के लिए बाध्य होगा, जिसमें शांतिपूर्ण विरोध स्वरूप इसका सार्वजनिक दहन भी शामिल होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसा कदम समुदाय की इच्छा से नहीं, बल्कि निरंतर प्रशासनिक अहंकार के कारण मजबूरी में उठाया जाएगा।

एकता का आह्वान करते हुए डॉ. सुरेश कुमार ने सभी पहाड़ी संगठनों, युवा समूहों, नागरिक समाज संस्थाओं और बुद्धिजीवियों से संवैधानिक गरिमा की रक्षा के लिए एकजुट होने का आग्रह किया। उन्होंने दोहराया कि पहाड़ी जातीय समूह की अनुसूचित जनजाति पहचान कानूनी, अंतिम और अपरिवर्तनीय है, और परित्यक्त पहचानों को पुनर्जीवित करने के किसी भी प्रयास का दृढ़ और लोकतांत्रिक ढंग से विरोध किया जाएगा।
पहाड़ी समुदाय इस कैलेंडर को पूरी तरह और सर्वसम्मति से अस्वीकार करता है। क़ानून को कैलेंडरों से नहीं बदला जा सकता और न ही संवैधानिक पहचान को नौकरशाही अवज्ञा से मिटाया जा सकता।
….









