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न्यायपालिका की संवेदनशीलता पर सवाल: क्या ऐसे फैसले से न्याय व्यवस्था पर भरोसा डगमगा रहा है ?

सबका जम्मू कश्मीर (राज कुमार)

देश में न्यायपालिका को हमेशा से एक ऐसी संस्था के रूप में देखा जाता रहा है जहाँ अंतिम उम्मीद, अंतिम आवाज और अंतिम न्याय मिलता है। लेकिन हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले ने न सिर्फ कानूनी समझ पर सवाल खड़े किए हैं बल्कि आम जनता के विश्वास पर भी चोट की है। मामला उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले का है, जहां 14 साल की नाबालिग लड़की ने तीन युवकों—पवन, आकाश और अशोक—पर रेप के प्रयास की FIR दर्ज करवाई थी। पीड़िता के अनुसार आरोपियों ने उसके स्तन को पकड़ा, पजामे का नाड़ा तोड़ा और उसे जबरन खींचकर ले जाने की कोशिश की।

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हालांकि, इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस राम मनोहर मिश्र ने इस घटना को रेप या रेप के प्रयास की श्रेणी में मानने से इनकार कर दिया।

कोर्ट का यह कहना कि “स्तन पकड़ना, पजामे का नाड़ा तोड़ना और खींचकर लेकर जाना रेप की कोशिश नहीं माना जा सकता”—न सिर्फ महिला सुरक्षा कानूनों की भावना का अपमान है बल्कि यह समाज में गलत संदेश भी देता है कि बलात्कार जैसी गंभीर घटनाओं की शुरुआत या प्रयास को हल्के में लिया जा सकता है।

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इस फैसले ने पूरे देश में आक्रोश पैदा कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले पर सख्त नाराज़गी जताई है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वे इस आदेश को खारिज करेंगे और ट्रायल जारी रहने देंगे। यह प्रतिक्रिया न सिर्फ न्याय के लिए एक सकारात्मक संकेत है बल्कि यह भी दर्शाती है कि देश की सर्वोच्च अदालत महिलाओं की सुरक्षा को लेकर किसी तरह की ढिलाई बर्दाश्त नहीं करेगी।

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यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब देश में महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा को लेकर कानून लगातार सख्त किए जा रहे हैं, तब न्याय व्यवस्था की कुछ टिप्पणियाँ उन प्रयासों को कमजोर करती नजर आती हैं। ऐसे फैसले उन महिलाओं के हौसले को तोड़ सकते हैं जो पहले ही समाज, परिवार और कानूनी व्यवस्था से लड़ते हुए न्याय तक पहुंचने की कोशिश करती हैं।

न्याय व्यवस्था में न्यायाधीशों की टिप्पणियाँ सिर्फ कानूनी महत्व नहीं रखतीं, वे समाज के लिए संदेश भी होती हैं। और जब ये संदेश गलत दिशा में जाएं तो उसका असर पीड़ितों, समाज और न्याय व्यवस्था तीनों पर पड़ता है।

यह समय है जब देश की अदालतें सिर्फ कानून की किताबें न देखें, बल्कि संवेदनशीलता, मनोविज्ञान और सामाजिक वास्तविकताओं को भी समझें। क्योंकि न्याय केवल फैसला नहीं होता, बल्कि विश्वास भी होता है — और वह विश्वास कमजोर नहीं होना चाहिए।

 

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