“दा ताज स्टोरी”: अभिमन्यु की वीरता से अर्जुन की रणनीति तक
अखिलेंद्र मिश्र का संवाद — शांतिपूर्ण संघर्ष और वैधानिक मार्ग की नई परिभाषा

लेखक : रविंद्र आर्य
आगरा की धरती पर फिल्म “दा ताज स्टोरी” का एक दृश्य आज भी दर्शकों के मन में गूंजता है।
मंच पर हल्की रोशनी है, पृष्ठभूमि में “हिन्द राष्ट्र पार्टी” का झंडा फहरा रहा है — एक काल्पनिक संगठन, जो राष्ट्र और संस्कृति के पुनर्जागरण का प्रतीक है।
मंच के केंद्र में खड़े हैं अखिलेंद्र मिश्र — एक ऐसे पात्र के रूप में, जो राष्ट्र के लिए सोचता है, पर हिंसा नहीं चाहता।
उनके सामने खड़े हैं परवेश रावल — एक युवा चेहरा, भावुक, तेजस्वी और प्रश्नों से भरा हुआ।
दृश्य में संवाद आरंभ होता है —
“परवेश, सुनो…”
स्वर में दृढ़ता है, पर भीतर करुणा भी। अखिलेंद्र मिश्र कहते हैं —
“अभिमन्यु ने जैसे सीमा के बीच वीरता दिखाई, उसने खुद को समर्पित किया;
लेकिन उसकी कहानी हमें यह भी सिखाती है कि बलिदान के बाद भी योजना और समझ जरूरी होती है।
अर्जुन ने हार नहीं मानी — उसने शोक में डूबकर नहीं, सोच-समझकर अगला कदम उठाया।”
यहीं से कहानी का मूल भाव सामने आता है — यह लड़ाई भावनाओं की नहीं, व्यवस्था की है।
यह संघर्ष तलवार का नहीं, संविधान और समाज की समझ का है।
ताज विवाद — बहस और वैधानिक समाधान की दिशा
फ़िल्म का यह दृश्य ताजमहल के ऐतिहासिक विवाद को पृष्ठभूमि में रखता है, लेकिन उसका केंद्र “सत्य की खोज” है, न कि टकराव।
अखिलेंद्र मिश्र का पात्र राष्ट्रवादी भावनाओं को उकसाता नहीं, बल्कि संयमित करता है।
वह कहता है —
“ताज-महल का जो विवाद है, उसे जबरदस्ती नहीं, बहस से, मुकदमों से और संवैधानिक रास्तों से हल किया जाएगा।”
यह संवाद न केवल फ़िल्म का, बल्कि पूरे विमर्श का सार बन जाता है।
यह भारत की उसी आत्मा को पुनर्जीवित करता है, जो कहती है — “संघर्ष करो, पर मर्यादा के भीतर।”
अखिलेंद्र मिश्र का पात्र इस बात को बार-बार दोहराता है कि देशहित का अर्थ कभी हिंसा नहीं हो सकता।
sabka jammu kashmir NOV 1 2025.qxd_1
काल्पनिक पार्टी, लेकिन असली विचार
हालाँकि हिन्द राष्ट्र पार्टी फिल्म में एक काल्पनिक राजनीतिक दल के रूप में दिखाई गई है,
पर इसके विचार आज के सामाजिक और वैधानिक परिदृश्य से सीधे संवाद करते हैं।
इस पार्टी का उद्देश्य किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ़ नहीं,
बल्कि सांस्कृतिक चेतना को संवैधानिक रास्ते से स्थापित करना है।
अखिलेंद्र मिश्र का यह कथन —
“फ़िल्म में काल्पनिक दृश्य हिन्द राष्ट्र पार्टी का तन-मन-धन का जो समर्थन मिला है, वह हमें हिंसा के लिए नहीं, संगठित मेहनत और सतर्क रणनीति के लिए चाहिए।”
एक ऐसी विचारधारा को जन्म देता है, जो “संग्राम” नहीं, “संयम” को प्राथमिकता देती है।
संघर्ष का नया अर्थ — शांति के भीतर शक्ति
फ़िल्म का यह संवाद आज के भारत के लिए एक दर्पण है —
जहाँ आस्था है, पर अंधविश्वास नहीं;
जहाँ विरोध है, पर वैमनस्य नहीं;
जहाँ आंदोलन है, पर राष्ट्र के खिलाफ़ नहीं।
अखिलेंद्र मिश्र का यह संवाद —
“हार न मानना, पर सभ्यता, कानून और देश के नियमों का पालन करना।”
भारतीय समाज को यह याद दिलाता है कि असहमति का भी अपना मर्यादित सौंदर्य होता है।
परवेश रावल का चरित्र — नई पीढ़ी की प्रतीक दृष्टि
फ़िल्म के इस दृश्य का अंत जब कैमरा परवेश रावल के चेहरे पर ज़ूम करता है,
तो उसकी आँखों में कोई आवेश नहीं, बल्कि एक जाग्रत निश्चय दिखाई देता है।
वह समझ चुका है कि अब संघर्ष का अर्थ संवेदनशील सोच और वैधानिक प्रयास है।
यही क्षण “दा ताज स्टोरी” को एक साधारण विवाद से ऊपर उठाकर
राष्ट्र के चिंतन की कहानी बना देता है।
भारत की आत्मा का शांत क्रांतिकारी स्वर
“दा ताज स्टोरी” में यह दृश्य केवल एक संवाद नहीं,
बल्कि भारत के आधुनिक राष्ट्रवाद की घोषणा जैसा है —
जहाँ धर्म और कानून, परंपरा और संविधान साथ चलते हैं।
अखिलेंद्र मिश्र का किरदार इस विचार का प्रतीक बनता है
कि भारत की असली शक्ति उसकी “शांति” में है,
और उसका असली आंदोलन तर्क और सत्य से जन्म लेता है।
लेखक : रविंद्र आर्य
(भारतीय संस्कृति, समाज और वैधानिक राष्ट्रवाद पर केंद्रित विश्लेषक लेखक)









