उर्दू हमारी पहचान और प्रशासन की रीढ़: एआईपी ने नायब तहसीलदार भर्ती में उर्दू को अनिवार्य बनाए रखने की उठाई मांग

सबका जम्मू कश्मीर
श्रीनगर, (इरफान गनी भट):जम्मू-कश्मीर में नायब तहसीलदार पदों के लिए उर्दू को अनिवार्य योग्यता से हटाने की संभावनाओं के बीच आवामी इत्तिहाद पार्टी (एआईपी) ने सरकार को दो टूक चेतावनी दी है। पार्टी ने साफ कहा है कि उर्दू सिर्फ एक भाषा नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर की प्रशासनिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान है, जिसे दरकिनार करना किसी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
एआईपी के मुख्य प्रवक्ता इनाम उन नबी ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा, “डोगरा शासनकाल से लेकर आज तक उर्दू इस प्रदेश की राजकाज की भाषा रही है। राजस्व रिकॉर्ड से लेकर अदालती फैसलों तक, हर जगह उर्दू का इस्तेमाल होता आया है। ऐसे में इसे नायब तहसीलदार की पात्रता सूची से हटाना न सिर्फ प्रशासनिक भूल होगी, बल्कि हमारी विरासत पर सीधा हमला होगा।”
उन्होंने दो टूक कहा कि यह केवल भाषा का सवाल नहीं, बल्कि प्रभावी प्रशासन और जनता से बेहतर संवाद की ज़रूरत है। “नायब तहसीलदार आम लोगों से रोजाना संवाद करते हैं। अगर उन्हें उर्दू नहीं आती तो वे लोगों की समस्याएं कैसे समझेंगे?”
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इनाम ने संविधान का हवाला देते हुए कहा कि उर्दू सातवीं अनुसूची में मान्यता प्राप्त भाषा है और जम्मू-कश्मीर में 1947 से पहले और बाद में भी यह सरकारी कामकाज की प्रमुख भाषा रही है।
उन्होंने केंद्र शासित प्रदेश में कैट (केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण) के हस्तक्षेप पर भी नाराज़गी जताई और कहा कि यह फैसला पूरी तरह अन्यायपूर्ण और राजनीतिक मंशा से प्रेरित लगता है।
“समावेशिता के नाम पर उर्दू को निशाना बनाना बंद हो। यह हमारी मातृभाषा है, हमारी प्रशासनिक रीढ़ है। इसे हटाना न जनता के हित में है, न शासन के।”
एआईपी ने उपराज्यपाल प्रशासन और जम्मू-कश्मीर सेवा चयन बोर्ड (JKSSB) से मांग की है कि वे उर्दू की संवैधानिक और प्रशासनिक प्रासंगिकता को कायम रखें और भर्ती प्रक्रिया में इसे अनिवार्य बनाए रखें।
इनाम ने दोहराया – “उर्दू कोई रुकावट नहीं, बल्कि यह हमारी पहचान, संस्कृति और कुशल शासन की मूलभूत भाषा है। इसे हटाना किसी भी सूरत में मंजूर नहीं।”









