
देश की न्याय व्यवस्था पर जनता का भरोसा उसकी सबसे बड़ी ताक़त माना जाता है। लोग अदालतों को न्याय का अंतिम सहारा समझते हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में हाई कोर्ट के कुछ फैसलों को लेकर जिस तरह असंतोष देखने को मिला है, उसने आम लोगों के मन में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। हाल ही में शिमला के बहुचर्चित युग हत्याकांड के फैसले के बाद फिर यही चर्चा तेज हो गई है।
शिमला में 2014 में मासूम युग का अपहरण कर बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। निचली अदालत ने तीनों दोषियों को फांसी की सज़ा सुनाई थी। लेकिन हाई कोर्ट ने 23 सितंबर को एक दोषी, तेजिंदर पाल, को बरी कर दिया और बाकी दो दोषियों की फांसी को उम्रकैद में बदल दिया। इस फैसले से नाराज़ युग के परिजन सुप्रीम कोर्ट पहुँच गए हैं। युग के पिता विनोद गुप्ता का कहना है कि वे अपने बेटे के लिए पूरा न्याय चाहते हैं और तीनों आरोपियों को फांसी की सज़ा दिलाने तक संघर्ष जारी रहेगा।
यह पहला मामला नहीं है जब हाई कोर्ट के फैसले को लेकर लोगों में असंतोष देखने को मिला हो। इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस राम मोहन मिश्रा के एक विवादित फैसले ने भी व्यापक आलोचना बटोरी थी, जिसमें उन्होंने एक गम्भीर यौन उत्पीड़न के मामले को अत्यंत हल्के तरीके से लिया। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले पर कठोर टिप्पणी करते हुए इसे खारिज किया और मामले की पुन: सुनवाई के निर्देश दिए।

तो सवाल यह है कि आखिर हाई कोर्ट के फैसलों पर इतना असंतोष क्यों दिखाई दे रहा है?
पहला कारण है जनता की अपेक्षा और भावनात्मक जुड़ाव। जब कोई मामला अत्यधिक संवेदनशील हो, खासकर बच्चों, महिलाओं या समाज में हलचल पैदा करने वाले अपराधों से जुड़ा हो, तो समाज कठोर सज़ा की उम्मीद करता है। ऐसे मामलों में जब अदालत साक्ष्यों के आधार पर सज़ा कम करती है या किसी आरोपी को बरी कर देती है, तो पीड़ित परिवार और समाज का गुस्सा बढ़ना स्वाभाविक है।

दूसरा कारण है कानूनी प्रक्रिया की जटिलता, जिसे आम लोग पूरी तरह समझ नहीं पाते। हाई कोर्ट साक्ष्यों, जांच की गुणवत्ता, गवाहों की विश्वसनीयता और विधिक प्रावधानों को ध्यान में रखकर निर्णय देता है, लेकिन जनता इसे अक्सर न्याय से समझौता मान लेती है।

तीसरा कारण है कि कुछ विवादित फैसलों ने न्यायपालिका की छवि पर सवाल खड़े किए। जब किसी न्यायालय की टिप्पणी या निर्णय सामाजिक संवेदनशीलता से दूर दिखाई देता है, तो यह आम लोगों के भरोसे को कमजोर करता है।

फिर भी, यह समझना जरूरी है कि हर फैसला कानून और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट जैसी सर्वोच्च संस्था ऐसे फैसलों पर अंतिम निर्णय लेकर न्याय व्यवस्था में संतुलन बनाए रखती है।
अब सबकी नज़र इस बात पर है कि सुप्रीम कोर्ट शिमला के युग हत्याकांड की अपील पर कितना शीघ्र सुनवाई करता है और पीड़ित परिवार को किस तरह का न्याय मिलता है। जनता अदालतों से सिर्फ निर्णय ही नहीं, बल्कि न्याय की अनुभूति भी चाहती है। इसी अनुभूति के टूटने से असंतोष जन्म लेता है। न्यायपालिका के प्रति भरोसा तभी मजबूत होगा जब फैसले न केवल विधिक दृष्टि से सही हों, बल्कि समाज की संवेदनाओं को भी ध्यान में रखें।

राज कुमार (मुख्य संपादक)
सबका जम्मू कश्मीर









