
राज कुमार (आलेख)
लोकतंत्र के तीन प्रमुख स्तंभ—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—के साथ-साथ पत्रकारिता को चौथा स्तंभ माना जाता है। इन स्तंभों की मजबूती से ही लोकतंत्र संतुलित और जीवंत रहता है। किंतु हाल के वर्षों में न्यायपालिका और पत्रकारिता, दोनों ही अपने-अपने दायित्वों, निष्पक्षता और विश्वसनीयता को लेकर सवालों के घेरे में आ गई हैं। यह स्थिति न केवल चिंताजनक है, बल्कि लोकतंत्र के भविष्य के लिए भी गंभीर संकेत देती है।
न्यायपालिका को संविधान का संरक्षक और नागरिकों के अधिकारों की अंतिम ढाल माना जाता है। आम आदमी की अपेक्षा रहती है कि अदालतें निष्पक्ष, त्वरित और प्रभावी न्याय प्रदान करेंगी। परंतु न्यायिक प्रक्रिया में बढ़ती देरी, लंबित मामलों का अंबार, और कभी-कभी विवादित फैसलों ने जनता के मन में असंतोष को जन्म दिया है। वर्षों तक चलने वाले मुकदमे पीड़ितों को मानसिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से तोड़ देते हैं। न्याय में देरी को न्याय से वंचित किए जाने के समान माना जाता है, लेकिन यह सच्चाई आज भी बार-बार सामने आती है।
इसके अतिरिक्त, न्यायपालिका पर यह आरोप भी लगते रहे हैं कि वह आम जनता की अपेक्षाओं से कटती जा रही है। कुछ मामलों में शक्तिशाली वर्गों को राहत और कमजोर पक्षों को लंबी कानूनी लड़ाइयों में उलझते देखा गया है। हालांकि यह कहना भी उचित नहीं होगा कि पूरी न्यायपालिका पक्षपाती है, क्योंकि अनेक जज आज भी साहसिक और ऐतिहासिक फैसले देकर लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा कर रहे हैं। फिर भी, व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और सुधार की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता।
दूसरी ओर, पत्रकारिता, जिसे समाज का दर्पण कहा जाता है, वह भी आज गंभीर संकट से गुजर रही है। पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सत्ता से सवाल पूछना, सच को सामने लाना और जनता की आवाज बनना है। लेकिन टीआरपी की दौड़, कॉरपोरेट दबाव और राजनीतिक प्रभाव ने इसके स्वरूप को काफी हद तक बदल दिया है। कई बार खबरों को सनसनीखेज बनाया जाता है, तथ्यों की पुष्टि के बिना आरोप लगाए जाते हैं और “ब्रेकिंग न्यूज़” की होड़ में जिम्मेदारी पीछे छूट जाती है।
फेक न्यूज और प्रायोजित खबरें पत्रकारिता की साख को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा रही हैं। सोशल मीडिया के दौर में अफवाहें तेजी से फैलती हैं और मुख्यधारा मीडिया भी कई बार बिना जांच के उन्हें आगे बढ़ा देता है। इससे समाज में भ्रम, तनाव और अविश्वास का माहौल बनता है। जब मीडिया खुद सवालों के घेरे में आ जाता है, तो जनता के पास भरोसेमंद सूचना का स्रोत सीमित हो जाता है, जो लोकतंत्र के लिए खतरनाक स्थिति है।
न्यायपालिका और पत्रकारिता के बीच एक और समानता यह है कि दोनों पर “अभिजात वर्ग” तक सीमित रहने का आरोप लगता रहा है। आम जनता की वास्तविक समस्याएं—गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य—अक्सर हाशिये पर चली जाती हैं, जबकि बड़े नाम, बड़े घोटाले और राजनीतिक बयान सुर्खियों में छाए रहते हैं। इससे जनसरोकार कमजोर पड़ते हैं और व्यवस्था से लोगों का भरोसा डगमगाने लगता है।
हालांकि, इस निराशाजनक तस्वीर के बीच उम्मीद की किरणें भी हैं। न्यायपालिका में समय-समय पर सुधार के प्रयास हुए हैं, जैसे ई-कोर्ट, फास्ट ट्रैक अदालतें और लोक अदालतें। वहीं पत्रकारिता में भी कई ईमानदार पत्रकार और स्वतंत्र मंच आज भी सच्चाई के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जोखिम उठा रहे हैं और समाज को जागरूक कर रहे हैं।
आवश्यकता इस बात की है कि न्यायपालिका अपनी प्रक्रियाओं को और अधिक पारदर्शी, त्वरित और जनोन्मुखी बनाए। वहीं पत्रकारिता को आत्ममंथन करते हुए अपने मूल सिद्धांतों—सत्य, निष्पक्षता और जनहित—की ओर लौटना होगा। सरकार, समाज और संस्थानों—तीनों की सामूहिक जिम्मेदारी है कि इन स्तंभों को कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत किया जाए।
अंततः, एक सशक्त लोकतंत्र के लिए यह अनिवार्य है कि न्यायपालिका पर जनता का विश्वास अडिग रहे और पत्रकारिता निडर होकर सच का साथ दे। यदि ये दोनों स्तंभ सवालों के घेरे में ही बने रहे, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर होना तय है। इसलिए समय रहते सुधार, जवाबदेही और नैतिकता को प्राथमिकता देना ही एकमात्र रास्ता है।

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