Blogआलेख

पत्रकारों की जांच प्रक्रिया: उद्देश्य स्पष्ट या अधिकारों पर नियंत्रण?

सबका जम्मू कश्मीर (राज कुमार)

जम्मू-कश्मीर में पिछले कुछ महीनों से पत्रकारिता और मीडिया से जुड़े मामलों पर सरकार की नजर साफ तौर पर गहरी होती दिख रही है। कश्मीर में हाल ही में हुई महत्वपूर्ण बैठक के बाद अब जिला स्तर पर भी पत्रकारों की जांच और सत्यापन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इसी क्रम में जिला कठुआ में कार्यरत विभिन्न समाचार पत्रों और टीवी चैनलों से जुड़े पत्रकारों से उनके अथॉरिटी लेटर, नियुक्ति प्रमाण पत्र और मीडिया संस्थान से जुड़े दस्तावेज मांगे जा रहे हैं। इस प्रक्रिया के शुरू होते ही पत्रकारिता जगत में कई सवालों ने जोर पकड़ लिया है।

sabka jammu kashmir 7 dec 2025.qxd_5

सरकार इस प्रक्रिया को “प्रमाणीकरण और पारदर्शिता” का नाम दे रही है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि मीडिया का हिस्सा वही लोग हों जो अधिकृत संस्थानों में कार्यरत हैं। प्रशासन का तर्क है कि बीते कुछ समय से फर्जी प्रेस कार्ड, अनधिकृत मीडिया हाउस और बिना संस्था से जुड़े स्वयंभू पत्रकारों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है, जो पत्रकारिता की आड़ में गलत गतिविधियों में शामिल पाए गए हैं। ऐसे में यह जांच प्रक्रिया, सरकार के अनुसार, व्यवस्था और विश्वसनीयता बनाए रखने का प्रयास है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या यह प्रक्रिया केवल व्यवस्था सुधार तक सीमित है या इसका लक्ष्य कुछ और है? क्या यह पहल पत्रकारों पर नियंत्रण स्थापित करने की दिशा में पहला कदम है? यह आशंका इसलिए भी मजबूत होती है क्योंकि कई स्वतंत्र पत्रकार, डिजिटल रिपोर्टर और सोशल मीडिया आधारित न्यूज़ क्रिएटर इस जांच दायरे में आ सकते हैं। सोशल मीडिया ने पत्रकारिता के दायरे और पहुंच दोनों को व्यापक बनाया है, लेकिन सरकार की यह जांच शायद इस नए वर्ग को चुनौती देती दिखाई दे रही है।

भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार है। यदि यह प्रक्रिया उसी स्वतंत्रता को सीमित करने का औजार बन गई, तो यह न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों पर प्रश्नचिह्न लगाएगी, बल्कि मीडिया की स्वायत्तता और निष्पक्षता पर भी गहरा असर डालेगी।

आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह प्रक्रिया व्यवस्था सुधार का हिस्सा है या स्वतंत्र आवाजों को सीमित करने की दिशा में उठाया गया कदम। फिलहाल पत्रकार समुदाय में बेचैनी और अनिश्चितता बनी हुई है। सवाल यह भी है कि क्या यह जांच केवल जम्मू-कश्मीर तक सीमित रहेगी या देशभर में इसी प्रकार की प्रक्रिया लागू होगी।

नतीजा चाहे जो भी हो, इतना तो तय है कि यह मुद्दा आने वाले समय में लोकतंत्र, मीडिया स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों पर एक बड़ी बहस को जन्म देगा।

Related Articles

Back to top button