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सोशल मीडिया पर सक्रिय पत्रकारों पर प्रशासन की नजर: फेक पत्रकारों की पहचान या अभिव्यक्ति की आज़ादी पर अंकुश?

सबका जम्मू कश्मीर (राजकुमार)

जम्मू-कश्मीर में इन दिनों सोशल मीडिया पर सक्रिय पत्रकारों को लेकर बहस तेज़ हो गई है। हाल ही में उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के उस वक्तव्य के बाद, जिसमें उन्होंने सभी जिला उपायुक्तों (DC) और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों (SSP) को अपने-अपने क्षेत्रों में सक्रिय पत्रकारों की सूची तैयार करने और फेक पत्रकारों की पहचान करने के निर्देश दिए, पत्रकार समुदाय में हलचल मच गई है।

दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे फेसबुक, एक्स (ट्विटर), यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर बड़ी संख्या में लोग खुद को ‘पत्रकार’ बताकर सक्रिय हैं। इनमें से कई ऐसे भी हैं जो किसी मान्यता प्राप्त मीडिया संस्थान से जुड़े नहीं हैं, फिर भी “प्रेस” के नाम पर गतिविधियां चलाते हैं। इस वजह से प्रशासन की चिंता भी वाजिब है कि कहीं फर्जी पहचान के सहारे लोग पत्रकारिता की आड़ में ब्लैकमेलिंग, अफवाह फैलाने या निजी स्वार्थ साधने का काम न कर रहे हों।

हालांकि, यह मामला सिर्फ फेक पत्रकारों तक सीमित नहीं रह गया है। असली चिंता उन पत्रकारों के बीच भी है जो वर्षों से राष्ट्रीय या स्थानीय चैनलों और समाचार पत्रों में कार्यरत रहे हैं, लेकिन बदलते समय में सोशल मीडिया को अभिव्यक्ति और रिपोर्टिंग का सशक्त माध्यम बना चुके हैं। ऐसे पत्रकारों का कहना है कि सरकार को किसी भी प्रकार की कार्रवाई से पहले यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वास्तविक पत्रकारों को परेशान न किया जाए।

संविधान का अनुच्छेद 19(1)(A) प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि यदि कोई पत्रकार सोशल मीडिया पर समाज से जुड़ी समस्याएं उठा रहा है, तो क्या उस पर भी कार्रवाई होगी? यह स्थिति अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश के समान मानी जा सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार का उद्देश्य पत्रकारिता को सीमित करना नहीं, बल्कि उसकी गरिमा और विश्वसनीयता को बनाए रखना है। परंतु यह तभी संभव है जब जांच निष्पक्ष और पारदर्शी हो। प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसे कदम से वास्तविक पत्रकारों की स्वतंत्रता पर कोई आंच न आए, जो लंबे समय से जनहित और पारदर्शिता की दिशा में कार्यरत हैं।

कुल मिलाकर, सोशल मीडिया के इस दौर में पत्रकारिता की परिभाषा बदल चुकी है। ऐसे में सरकार को “फेक पत्रकार” और “सच्चे पत्रकार” के बीच की रेखा खींचने से पहले गहन समीक्षा करनी होगी, ताकि न तो पत्रकारिता की साख गिरे और न ही लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की आवाज़ दबे।

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